खजुराहो मंदिर का असली इतिहास क्या है? जानिए कामुक मूर्तियों का राज। Khajuraho Temples

खजुराहो मंदिर का असली इतिहास: प्रेम, शिल्प और आध्यात्मिकता की अद्भुत गाथा

Khajuraho Temples

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में बसा खजुराहो मंदिर (Khajuraho Temple) सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय वास्तुकला, इतिहास और कला का एक अनमोल रत्न है। यह स्थल अपनी अप्सराओं की मूर्तियों और प्रसिद्ध कामुक मूर्तियों की नक्काशी के लिए दुनियाभर में विख्यात है। लेकिन इसके पीछे खजुराहो मंदिर का इतिहास (Khajuraho Mandir ka Itihas) केवल यौन मूर्तियों का प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि यह 10वीं - 12वीं शताब्दी के भारतीय समाज की सहिष्णुता, आध्यात्मिक गहराई और कलात्मक उत्कर्ष की कहानी कहता है।

1986 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) के रूप में मान्यता प्राप्त इस परिसर को आज भी लाखों पर्यटक देखने आते हैं। आइए, इस लेख में हम खजुराहो के मंदिरों (Khajuraho ke Mandir) के असली इतिहास, वास्तुकला की बारीकियों और यहाँ बनी अद्भुत मूर्तियों के रहस्यों को विस्तार से समझते हैं।

खजुराहो मंदिर का इतिहास: चंदेल वंश का स्वर्णकाल, नाम की उत्पत्ति।

खजुराहो नाम (Khajuraho name meaning) संस्कृत के दो शब्दों ‘खर्जुर’ (खजूर) और ‘वाहक’ (वाहक/ले जाने वाला) से मिलकर बना है। ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में इस मंदिर परिसर के आठ प्रवेश द्वार थे और प्रत्येक द्वार पर दो-दो खजूर के पेड़ थे, जिससे इसका नाम ‘खर्जुरवाहक’ (Kharjuravahaka) पड़ा । स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, मंदिरों के द्वार पर सोने के खजूर के पेड़ हुआ करते थे, जो समय के साथ लुप्त हो गए ।

चंदेल वंश का उदय और मंदिर निर्माण

खजुराहो मंदिर निर्माण (Khajuraho temple construction) का श्रेय चंदेल वंश (Chandela Dynasty) के राजाओं को जाता है। यह वही वंश था जिसने बुंदेलखंड क्षेत्र पर लगभग 9वीं - 12वीं शताब्दी तक शासन किया। चंदेल वंश के राजाओं ने 950 ईस्वी से 1050 ईस्वी के बीच इन मंदिरों का निर्माण कराया था।

दिलचस्प बात यह है कि खजुराहो मंदिर समूह (Khajuraho Group of Monuments) किसी एक राजा की कल्पना नहीं थी, बल्कि यह परंपरा पीढ़ियों तक चली। प्रत्येक चंदेल शासक ने अपने कार्यकाल में इन मंदिरों के विकास में योगदान दिया । प्रारंभिक चरण में राजा यशोवर्मन ने लक्ष्मण मंदिर (Lakshmana Temple) का निर्माण कराया, जिसे 954 ईस्वी में उनके पुत्र धंग ने पूरा किया । इसके बाद राजा विद्याधर के शासनकाल (1017-1029 ईस्वी) में सबसे भव्य और विशाल कंदरिया महादेव मंदिर (Kandariya Mahadev Temple) का निर्माण हुआ ।

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खजुराहो में कितने मंदिर थे और कितने बचे?

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, 12वीं शताब्दी तक खजुराहो में 85 मंदिर (Khajuraho 85 temples) थे, जो लगभग 20 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हुए थे । लेकिन समय के साथ, आक्रमणों और प्राकृतिक कारणों से अधिकांश मंदिर नष्ट हो गए। आज केवल 25 मंदिर (Khajuraho 25 temples) ही शेष बचे हैं, जो लगभग 6 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं । ये मंदिर तीन समूहों में विभाजित हैं- 

  1. पश्चिमी समूह (Western Group): सबसे बड़ा और सबसे प्रसिद्ध समूह, जहाँ कंदरिया महादेव, लक्ष्मण, विश्वनाथ और चित्रगुप्त मंदिर स्थित हैं।

  1. पूर्वी समूह (Eastern Group): यहाँ मुख्यत जैन मंदिर हैं, जिनमें पार्श्वनाथ, आदिनाथ और शांतिनाथ मंदिर प्रमुख हैं।
  2. दक्षिणी समूह (Southern Group): इसमें दुल्हादेव और चतुर्भुज मंदिर शामिल हैं।

खजुराहो की वास्तुकला: नागर शैली की अद्वितीय प्रतिभा।

खजुराहो के मंदिर नागर शैली (Nagara style of architecture) में बने हैं, जो उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की पहचान है। इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता है शिखर (Shikhara) – जो मंदिर के ऊपर बना ऊंचा, मीनारनुमा भाग होता है।

कंदरिया महादेव शिखर की वास्तुकला।

कंदरिया महादेव मंदिर (Kandariya Mahadev Temple) इस समूह का सबसे बड़ा और सबसे भव्य मंदिर है। यह मंदिर 31 मीटर (लगभग 102 फीट) ऊंचा है और इसके शिखर पर 84 छोटे शिखर बने हैं, जो एक पर्वत श्रृंखला का आभास कराते हैं । ऐसी मान्यता है कि इसे हिमालय का प्रतीक मानकर बनाया गया था, जो भगवान शिव का निवास स्थान है।

हर मंदिर की संरचना में पांच मुख्य भाग होते हैं- 

  1. अर्ध मंडपम (प्रवेश कक्ष)
  2. मंडपम (सभा मंडप)
  3. अंतराल (गर्भगृह का मार्ग)
  4. गर्भगृह (मुख्य देवता का कक्ष)
  5. परिक्रमा पथ (गर्भगृह के चारों ओर का मार्ग)

बड़े मंदिरों में महामंडपम और चारों कोनों पर सहायक मंदिर (पंचायतन शैली) भी होते हैं ।

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मूर्तियों का रहस्य: कामुक चित्रण केवल 10% ही क्यों?

जब भी खजुराहो की मूर्तियां (Khajuraho sculptures) की चर्चा होती है, तो सबसे पहले दिमाग में कामुक नक्काशी (Erotic Sculptures) आती है। लेकिन सच्चाई यह है कि खजुराहो मंदिरों में कामुक मूर्तियों की संख्या कुल मूर्तियों का 10% से भी कम है। तो फिर इतनी चर्चा क्यों? इसके पीछे कई ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कारण हैं- 

  1. तांत्रिक परंपरा से जुड़ाव:- कुछ विद्वानों का मानना है कि उस समय तांत्रिक साधना (Tantric practices) की परंपरा प्रचलित थी, जिसमें शारीरिक सुख को आध्यात्मिक यात्रा का एक हिस्सा माना जाता था। इन मूर्तियों के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि सांसारिक इच्छाओं का त्याग करने के बजाय, उन्हें नियंत्रित करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है ।
  2. आश्रमों में शिक्षा का माध्यम:- एक अन्य लोकप्रिय मान्यता यह है कि उस समय बालक ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। गृहस्थ जीवन में प्रवेश से पहले, इन मूर्तियों के माध्यम से उन्हें कामशास्त्र (Kama Sutra) और दांपत्य जीवन की शिक्षा दी जाती थी ।
  3. शुभता और सृजन का प्रतीक:- प्राचीन वास्तुशास्त्र में मिथुन (Mithuna – युगल) मूर्तियों को शुभ और सृजन का प्रतीक माना गया है। ये मूर्तियां केवल बाहरी दीवारों पर बनाई गई हैं, जबकि अंदर के हिस्से में केवल देवी-देवताओं की शांत और आध्यात्मिक मूर्तियां हैं। यह व्यवस्था बताती है कि सांसारिक इच्छाओं को बाहर छोड़कर ही भीतर प्रवेश करना चाहिए ।
  4. सह-अस्तित्व का प्रतीक:- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ हिंदू और जैन मंदिर (Hindu and Jain temples) एक साथ बने हैं। यह उस युग में धार्मिक सहिष्णुता और सद्भाव का जीता-जागता उदाहरण है। यहाँ शिव, विष्णु, सूर्य देव, गणेश और जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां एक ही परिसर में विद्यमान हैं ।

इतिहास के पन्नों में: उत्थान, पतन और पुनर्खोज

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आक्रमण और उपेक्षा का दौर-

13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के शासक कुतुब-उद-दीन ऐबक (Qutb-ud-din Aibak) ने चंदेल साम्राज्य पर आक्रमण किया। इस दौरान मंदिर परिसर के बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया गया । 1495 ईस्वी में सिकंदर लोदी के अभियान ने भी मंदिरों को क्षति पहुंचाई ।

हालांकि, मोरक्को के प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता (Ibn Battuta) ने 1335-1342 ईस्वी के बीच अपनी यात्रा वृत्तांत में खजुराहो का उल्लेख किया था। उन्होंने लिखा कि यहाँ मुस्लिम आक्रमणों से क्षतिग्रस्त मूर्तियों के बीच योगी रहते थे और कई मुसलमान उनसे योग सीखने आते थे ।

जंगल में खोया, फिर मिला-

आक्रमणों के बाद स्थानीय लोगों ने इस क्षेत्र को छोड़ दिया। घने जंगलों ने इन मंदिरों को अपने आगोश में ले लिया। सदियों तक ये मंदिर वनस्पतियों से ढके रहे और लोगों की नज़रों से दूर रहे। केवल स्थानीय लोग और साधु-संत ही शिवरात्रि जैसे अवसरों पर यहाँ पूजा करने आते थे ।

1838 में ब्रिटिश सेना के अधिकारी टी.एस. बर्ट (T.S. Burt) ने स्थानीय लोगों की मदद से इन मंदिरों को पुनः खोजा (Rediscovery of Khajuraho) और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के जर्नल में इसकी जानकारी प्रकाशित कराई । इसके बाद अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1850-60 के दशक में इन मंदिरों का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण किया ।

आज का खजुराहो: यात्रा की संपूर्ण जानकारी, कैसे पहुँचें?

  • हवाई मार्ग: खजुराहो का अपना घरेलू हवाई अड्डा (Khajuraho Airport) है, जो दिल्ली, मुंबई, वाराणसी और भोपाल से जुड़ा है। हवाई अड्डा मंदिर परिसर से मात्र 2 किलोमीटर दूर है ।
  • रेल मार्ग: खजुराहो रेलवे स्टेशन शहर से 5 किलोमीटर दूर है। महोबा (78 किमी) सबसे निकट का प्रमुख रेलवे जंक्शन है ।
  • सड़क मार्ग: राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़ा, झांसी (175 किमी), ग्वालियर (281 किमी) और भोपाल (375 किमी) से सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है ।


यात्रा का सबसे अच्छा समय

अक्टूबर से फरवरी (October to February) का मौसम यहाँ घूमने के लिए सबसे उपयुक्त है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। फरवरी माह में आयोजित होने वाला खजुराहो नृत्य महोत्सव (Khajuraho Dance Festival) देशभर से कलाकारों को आकर्षित करता है ।

खजुराहो से अन्य निकटवर्ती आकर्षण-

  • पन्ना राष्ट्रीय उद्यान (Panna National Park): 96 किमी दूर, बाघ सफारी के लिए प्रसिद्ध।
  • रानेह फॉल (Raneh Falls): 21 किमी दूर, 30 मीटर गहरी घाटी में बनता जलप्रपात।
  • पांडव फॉल (Pandav Fall): 34 किमी दूर, महाभारत काल से जुड़ी मान्यता।

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खजुराहो सिर्फ कामुकता नहीं, संस्कृति का दर्पण

खजुराहो मंदिर (Khajuraho Temple) केवल प्रसिद्ध कामुक मूर्तियों का पर्याय नहीं है। यह भारतीय स्थापत्य कला (Indian architecture), सहिष्णुता (religious tolerance) और आध्यात्मिकता (spirituality) का अद्भुत संगम है। यहाँ की हर मूर्ति, हर शिखर और हर मंडप हमें बताता है कि जीवन के हर पहलू – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अपना एक स्थान है।

जब आप अगली बार खजुराहो जाएँ, तो वहाँ की नक्काशी को केवल सतही दृष्टि से न देखें। उन मूर्तियों में छिपे दर्शन को समझने का प्रयास करें। तब आपको पता चलेगा कि यह स्थल सचमुच यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Site) की उस पदवी का हकदार है जो इसे 1986 में इसे मिली थी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न: खजुराहो मंदिरों का निर्माण किसने करवाया था?

उत्तर:- खजुराहो मंदिरों का निर्माण चंदेल वंश के राजाओं ने 950 ईस्वी से 1050 ईस्वी के बीच करवाया था ।

प्रश्न: खजुराहो में कितने मंदिर हैं?

उत्तर:- मूल रूप से 85 मंदिर थे, लेकिन आज केवल 25 मंदिर शेष बचे हैं ।

प्रश्न: खजुराहो मंदिरों में कामुक मूर्तियाँ क्यों बनाई गईं?

उत्तर:- इन मूर्तियों के पीछे कई कारण हैं – तांत्रिक परंपरा, युवाओं को गृहस्थ जीवन की शिक्षा, और सृजन व शुभता का प्रतीक । ध्यान देने योग्य बात यह है कि कामुक मूर्तियाँ कुल मूर्तियों का केवल 10% से भी कम हैं ।

प्रश्न: खजुराहो जाने का सबसे अच्छा समय क्या है?

उत्तर:- अक्टूबर से फरवरी का महीना यात्रा के लिए सर्वोत्तम है। फरवरी में यहाँ खजुराहो नृत्य महोत्सव भी आयोजित होता है ।

प्रश्न: खजुराहो मंदिरों को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया गया?

उत्तर:- 1986 में खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा दिया गया था ।

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